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विजय दशमी

Posted On: 23 Oct, 2012 Others में

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जलते-जलते भी रावण
अट्टाहस कर रहा था
अपनी हंसी से दुनिया
को चिढ़ा रहा था.

हर साल भेंट आग की
मुझे चढ़ाते हो
फिर भी पहले से प्रबल
मुझे पाते हो.

जल कर भी मैं
मिट नहीं पाता हूँ
हर मन में जीवन शक्ति
नित नई पाता हूँ.

अब दस नहीं
असंख्य शीश हस्त हैं
मेरे सामने सभी
कलयुगी राम पस्त हैं.

बाहर नहीं भीतर
मेरा वध जरुरी है .
मन में सुप्त सत्य को
जागृत करना जरुरी है.

न्याय, प्रेम, समानता के
बाणों का संधान करो
ना बच पाए अबके रावण
ऐसा तुम विधान करो.

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 24, 2012

आदरणीय रविंदर कुमार जी, आप की कविता विजयदशमी पर बड़ा ही सार्थक सन्देश दे रही है और प्रस्तुति भी बड़े सधे शब्दों में है– “अब दस नहीं असंख्य शीश हस्त हैं मेरे सामने सभी कलयुगी राम पस्त हैं. बाहर नहीं भीतर मेरा वध जरुरी है . मन में सुप्त सत्य को जागृत करना जरुरी है. न्याय, प्रेम, समानता के बाणों का संधान करो ना बच पाए अबके रावण ऐसा तुम विधान करो |” हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 16, 2012

    संतलाल जी, नमस्कार. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद्. कृपया भविष्य में भी संपर्क बनाये रखियेगा. नमस्ते जी.

D33P के द्वारा
October 24, 2012

मेरे सामने सभी कलयुगी राम पस्त हैं. बाहर नहीं भीतर मेरा वध जरुरी है …… कितनी खूबसूरत बात कही है …..रावण रूपी बुराई को हम हर साल जलाते है फिर भी रावण जिन्दा है जिसे मूल से समाप्त करने के लिए फिर किसी राम को पुनः जनम लेना होगा !!!!!!!!विजयादशमी की शुभकामनाएं स्वीकार करे ……

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 16, 2012

    नमस्कार जी, आपने समय दिया. आपका धन्यवाद्.

nishamittal के द्वारा
October 25, 2012

आपकी रचना बहुत प्रभावी है रविन्द्र जी हर साल भेंट आग की मुझे चढ़ाते हो फिर भी पहले से प्रबल मुझे पाते हो. जल कर भी मैं मिट नहीं पाता हूँ हर मन में जीवन शक्ति नित नई पाता हूँ. बधाई आपको

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 16, 2012

    निशा जी, नमस्कार. आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत महत्तवपूर्ण है. धन्यवाद् .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 25, 2012

समसामयिक सुन्दर प्रस्तुति के लिए रविंदर जी , आप को बधाई ! अब ऐसा समय आ गया है कि रावण खुद ही अपनी मौत मरेगा !

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 16, 2012

    विजय जी, नमस्कार. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. संपर्क बनाये रखिएगा.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 14, 2012

मन में सुप्त सत्य को जागृत करना जरुरी है. न्याय, प्रेम, समानता के बाणों का संधान करो ना बच पाए अबके रावण ऐसा तुम विधान करो. आदरणीय रविन्द्र जी, सादर बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, बधाई. शुभ दीपावली.

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 16, 2012

    प्रदीप जी, सादर नमस्कार. सबसे पहले आपको दीपावली की शुभकामनाएं. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

seemakanwal के द्वारा
November 17, 2012

बाहर नहीं भीतर मेरा वध जरुरी है . मन में सुप्त सत्य को जागृत करना जरुरी है. सार्थक सन्देश देती सुन्दर रचना . हार्दिक बधाई

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 18, 2012

    सीमा जी, नमस्कार. बाहर तो बहुत जला चुके, जब तक भीतर के रावण को नहीं मारेंगे तब तक सार्थक परिणाम नहीं मिलेंगे. प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद्. नमस्ते जी.

Sushma Gupta के द्वारा
November 18, 2012

प्रिय रविन्द्र जी,न्याय, प्रेम, समानता के बाणों का संधान करो ना बच पाए अबके रावण ऐसा तुम विधान करो. भावों से परिपूर्ण बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..वधाई…

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 19, 2012

    सुषमा जी, सादर नमस्कार. आप ने समय निकाल कर प्रतिक्रिया दी, धन्यवाद्. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा. नमस्ते जी.

Lahar के द्वारा
November 21, 2012

सुन्दर कविता

    Ravinder kumar के द्वारा
    November 21, 2012

    महोदय, सादर नमस्कार. प्रतिक्रिया देने के लिए आभार. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा . नमस्ते जी.


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