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सत्संग (लघु कथा)

Posted On: 16 Feb, 2013 Others,मेट्रो लाइफ में

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बूढ़ी सास खाट में पड़ी पानी-पानी की रट लगाए थी. बहू अपने बनाव श्रृंगार में व्यस्त थी. बहू जैसे ही बाहर निकलने को हुई, सास ने फिर टोका,’बहू ! जाते-जाते जरा एक गिलास पानी तो पिला जा.’ सासू माँ क्या आप भी जाते हुए ही टोका करो ? आपको मालूम है ना मुझे सत्संग में देर हो रही है. बहू ने झल्लाहट में कहा और रसोई में चली गई. रसोई में इधर-उधर देखा तो साफ़ बर्तन ही न मिला. मिलता भी कैसे ? रात काम वाली बाई जो नहीं आई थी. बहू ने पैर पटके और एक झूठा गिलास उठा, पानी से भर कर सास को पकड़ा दिया और बाहर निकल गई.

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
February 16, 2013

वाह रे सत्संग ,बूढ़ी सास पानी को तरसें और …………

    Ravinder kumar के द्वारा
    February 17, 2013

    निशा जी, सादर नमस्कार. समय देने के लिए धन्यवाद्.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 18, 2013

बहुत सुन्दर रवीन्द्र जी ऐसी बहुओं को ऐसे समाज को ऐसा तमाचा ही चाहिए …..व्यंग्य और इस समय के हालात का सटीक वर्णन …सारा सत्संग कचरे में गया …..तौबा तौबा ….. मानव मानवता अब तो कचरे कूड़े के ढेर में ही …… भ्रमर ५

    Ravinder kumar के द्वारा
    February 21, 2013

    भ्रमर जी, नमस्कार. आज ऐसा ही चल रहा है के, लोग भक्ति के मर्म को समझ नहीं पा रहे हैं. लोगों के लिए सत्संग एक औपचारिकता बन के रह गया है. आपने समय दिया उसके लिए आपको धन्यवाद् .

Sushma Gupta के द्वारा
February 19, 2013

श्री रविन्द्र जी, आपकी यह लघु कथा ऐसे लोगो के मूंह पर करारा तमाचा है , जो सत्संग के नाम पर अपने घर में अपने बड़ो की देख-रेख व् उनका ज़रा भी सम्मान नहीं करते ..ऐसे सत्संग से क्या लाभ .. सार्थक लेख { मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है }

    Ravinder kumar के द्वारा
    February 21, 2013

    सुषमा जी, सादर नमस्कार. आज सत्संग के नाम पर दिखावा चल रहा है. लोग अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ कर सत्संग सुनने में, (समझने में नहीं), लगें हैं. मैं आपके ब्लॉग का लाभ अवश्य उठाऊंगा. धन्यवाद्.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 19, 2013

रविंदर जी, सप्रेम !….सीख भरी लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई !

    Ravinder kumar के द्वारा
    February 21, 2013

    गुंजन जी, सादर नमस्कार. समय देने के लिए धन्यवाद्.

seemakanwal के द्वारा
February 20, 2013

यथार्थ कथा .आजकल सब और यही दिख रहा है बिलकुल सत्य लिखा है . हार्दिक आभार .

    Ravinder kumar के द्वारा
    February 21, 2013

    सीमा जी, सादर नमस्कार सुनते तो सब हैं, लेकिन जो सुना वहीँ झाड़ के सब आ जाते हैं. ऐसे सत्संग का क्या लाभ. सीमा जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

chaatak के द्वारा
April 28, 2013

स्नेही रविन्द्र जी, सादर अभिवादन, ये तो नावक के तीर जैसी लघु कथा है, बहुत खूब !!!!

    Ravinder kumar के द्वारा
    April 29, 2013

    आदरणीय चातक जी, सादर नमस्कार. अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद्.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 2, 2013

वाह रे सत्संगी धन्य हो बधाई, सर जी

    Ravinder kumar के द्वारा
    May 4, 2013

    प्रदीप जी, सादर नमस्कार. प्रतिक्रिया के धन्यवाद् सर जी.


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