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जिंदगी की धूप

Posted On: 21 Sep, 2013 Others,social issues,कविता में

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जिंदगी की धूप में
छांव ढूँढ़ते हैं
दो घूंट पानी और
एक ठाँव ढूँढ़ते हैं.
रात-दिन की दौड़-धूप में
मिले पल भर का विश्राम
ऐसा कोई नगर नहीं
एक गाँव ढूँढ़ते हैं.
कहने को तो हवा है
मेरे शहर में भी
मगर भर ले भीतर तक
वो सांस ढूँढ़ते हैं.
फूल तो बहुत हैं
मेरे घर के आस-पास
देख उन्हें अधरों पर फ़ैल जाए
वो मुस्कान ढूँढ़ते हैं.
कहने को तो
सालों से जिए जा रहा हूँ
मगर बस हो अपनी
वो सांझ ढूँढ़ते हैं.
जिंदगी की धूप में
छांव ढूँढ़ते हैं

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 21, 2013

ऐसा कोई नगर नहीं एक गाँव ढूँढ़ते हैं. कहने को तो हवा है मेरे शहर में भी मगर भर ले भीतर तक वो सांस ढूँढ़ते हैं…..सुन्दर पंक्तियाँ..आभार.. अपने विचारो से हमें भी अवगत कराएँ… 

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 26, 2013

    प्रदीप जी, सादर नमस्कार. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद्. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा.

Santosh Varma के द्वारा
September 21, 2013

सुन्दर कविता

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 26, 2013

    संतोष जी, सादर नमस्कार. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा.

nishamittal के द्वारा
September 23, 2013

ऐसा कोई नगर नहीं एक गाँव ढूँढ़ते हैं. कहने को तो हवा है मेरे शहर में भी मगर भर ले भीतर तक वो सांस ढूँढ़ते हैं. फूल तो बहुत हैं मेरे घर के आस-पास देख उन्हें अधरों पर फ़ैल जाए वो मुस्कान ढूँढ़ते हैं. सुन्दर अभिव्यक्ति

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 26, 2013

    निशा जी, सादर नमस्कार. आज हर आदमी उन पलों की तलाश में है, जिन्हें वो अपना कह सके. ऐसे पल जब वो हो और प्रकृति हो. निशा जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा.

Ravinder kumar के द्वारा
September 25, 2013

प्रदीप जी, सादर नमस्कार. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद्. भविष्य में भी संपर्क बनाए रखिएगा.

September 26, 2013

बहुत सुन्दर

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    शालिनी जी, सादर नमस्कार प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

yogi sarswat के द्वारा
September 27, 2013

मेरे शहर में भी मगर भर ले भीतर तक वो सांस ढूँढ़ते हैं. फूल तो बहुत हैं मेरे घर के आस-पास देख उन्हें अधरों पर फ़ैल जाए वो मुस्कान ढूँढ़ते हैं. कहने को तो सालों से जिए जा रहा हूँ मगर बस हो अपनी वो सांझ ढूँढ़ते हैं. जिंदगी की धूप में छांव ढूँढ़ते हैं सुन्दर शब्द और अभिव्यक्ति श्री रविंदर कपूर जी !

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    योगी जी, सादर नमस्कार. आप ब्लॉग पर आए, आपका धन्यवाद्. प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद्.

Jaishree Verma के द्वारा
September 27, 2013

कहने को तो सालों से जिए जा रहा हूँ मगर बस हो अपनी वो सांझ ढूँढ़ते हैं.भावपूर्ण अभिव्यक्ति रविन्द्र कुमार जी !

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    जयश्री जी, सादर नमस्कार. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
September 27, 2013

अच्छी रचना

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    यतीन्द्रनाथ जी, सादर नमस्कार. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

Madan Mohan saxena के द्वारा
September 27, 2013

सुन्दर.अच्छी रचना.रुचिकर प्रस्तुति .; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ कभी इधर भी पधारिये ,

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    मदन मोहन जी, सादर प्रणाम. आपको रचना अच्छी लगी, रचना का हेतु पूरा हुआ. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

Ritu Gupta के द्वारा
September 28, 2013

बहुत ही उम्दा भावमयी सकारत्मक रचना

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 28, 2013

    ऋतु जी, सादर प्रणाम. प्रशंसा के लिए आपका धन्यवाद्.

ushataneja के द्वारा
September 28, 2013

वाह, बहुत बढ़िया! मगर बस हो अपनी वो सांझ ढूँढ़ते हैं. जिंदगी की धूप में छांव ढूँढ़ते हैं आभार!

    Ravinder kumar के द्वारा
    October 5, 2013

    उषा जी, सादर प्रणाम. प्रशंसा के लिए आपका धन्यवाद्.

Sushma Gupta के द्वारा
September 29, 2013

रविन्द्र जी , जिन्दगी की धूप में सुकून और विश्राम की छाँव की हर किसी को ही आवश्यकता होती है, जिसे आपने अपने विचारों के द्वारा सुन्दर -रूप में प्रस्तुत किया है , सार्थक रचना हेतु वधाई व् आभार …

    Ravinder kumar के द्वारा
    October 5, 2013

    सुषमा जी, सादर नमस्कार. ब्लॉग पर आप आये और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया दी. इसके लिए आपका धन्यवाद्.

Anuj Diwakar के द्वारा
October 17, 2013

बेहद खूबसूरत रचना …!!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 15, 2014

जिंदगी की धूप में छांव ढूँढ़ते हैं दो घूंट पानी और एक ठाँव ढूँढ़ते हैं. रात-दिन की दौड़-धूप में मिले पल भर का विश्राम ऐसा कोई नगर नहीं एक गाँव ढूँढ़ते हैं. सुन्दर तलाश एक बावरे मन कि , सादर बधाई


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