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पुलिस में हो सुधार

Posted On: 4 Jun, 2014 Others,social issues में

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आजकल एक चैनल पर एक हास्य धारावाहिक का विज्ञापन अक्सर दिखाया जाता है. जिसमें लाइसेंस न दिखाने पर एक पुलिस वाला, चाय-पानी और हरियाली जैसे शब्दों का प्रयोग रिश्वत मांगने के लिए करता है. कितनी ही ऐसी फिल्में और धारावाहिक हैं, जिनमें पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ दिखाया जाता है. अब पुलिस की ऐसी छवि यों ही नहीं बन गई, अपितु इसके पीछे कड़वी सच्चाई है. हम सब ये जानते है के पुलिस का भय अपराधियों में कम और आम नागरिकों में अधिक है. पुलिस की भ्रष्ट छवि के कारण ही समाज में अपराधों की संख्या में इजाफा हुआ है. इसमें कोई दो राय नहीं होंगी के यदि हमारी पुलिस समय पर और त्वरित कार्य करे तो अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है. हालांकि बहुत से ऐसे पुलिस कर्मी भी है जो अपनी ड्यूटी पूरी लगन व ईमानदारी से करते हैं. उनकी बदौलत ही आज भी आम जनता का पुलिस पर विश्वास बना हुआ है.
सरकार कानून बनाती है पर उसे लागु करवाने का काम पुलिस का होता है. लेकिन हमारी पुलिस खुद ना तो उन कानूनों का पालन करती है ना ही उनका सम्मान. उदहारण के लिए पुलिस चाहती है के दोपहिया चलाते समय लोग हेलमेट पहनें. परन्तु पुलिस कर्मी कितना इस कानून का पालन करते हैं. छोटे नगरों में तो ना के बराबर. रिश्वत, ह्त्या, बलात्कार, जबरन वसूली जैसे कितने ही दाग हैं जो खाकी पर लगे हैं. लेकिन पुलिस है के चेतने का नाम नहीं लेती.
पुलिस का काम बहुत ही संवेदनशील काम है. पुलिस सताए हुए, लोगों के लिए आशा की किरण होती है. लेकिन यही किरण आज धूमिल होती जा रही है. थाने में बैठा थानेदार या दारोगा, एक आम आदमी के लिए निरंकुश सत्ता का प्रतिक होता है. जिसके सामने बोलना सता को ललकारने के समान है. इसलिए हाशिये पर बैठा कोई पीड़ित, डरा सहमा सा उसके सामने जाता है तो उसे अक्सर अपमानित कर के भगा दिया जाता है.
अब प्रश्न यह उठता है के हमारी पुलिस इतनी असंवेदनशील. गैरजिम्मेदार क्यों है. कारण तो बहुत हैं, जैसे प्रशिक्षण की कमी, भर्ती में भाई भतीजावाद, उच्चाधिकारियों-नेताओं का दबाव और सामाजिक समीकरण. लेकिन यहाँ मैं

इसके मुख्य कारण की चर्चा करूंगा. इसका सब से बड़ा कारण है के हमारे यहाँ कोई ऐसी वयवस्था नहीं है जो पुलिस के काम को देखे और विश्लेषण करे और जहाँ कहीं कमी मिले तुरंत और सख्त कार्यवाही करे. पुलिस पर जांच के लिए उसी राज्य के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति की जाती है. जो अपने उच्चाधिकारियों और नेताओं के दबाव में काम करते हैं और भ्रष्ट पुलिस कर्मी बच निकलते हैं. सरकार को चाहिए वो ऐसा आयोग बनाये जो पुलिस के कार्यों की देख रेख कर सके. जिसका पुलिस विभाग से कोई सम्बन्ध ना हो. जिसके पास दोषी पुलिस कर्मी को बर्खास्त करने, केस दर्ज करने, जांच करने, और अदालत में उसे साबित करने की ताकत हों. दोषी पुलिस कर्मियों के लिए सख्त सजाओं का प्रावधान हो. दूसरा थानेदार रैंक तक के अधिकारियों को भारतीय पुलिस सेवा में शामिल लिया जाए. उनकी नियुक्ति गृह राज्यों में न की जाए. वर्मा आयोग की सिफारिशों को तुरंत व प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.
एक जिम्मेदार पुलिस व्यवस्था ही देश में अपराधों पर लगाम लगा सकती है. समाज है तो अपराधी भी रहेंगे. परन्तु ईमानदार, संवेदनशील, जवाबदेह पुलिस इनको कुचलने में कामयाब होगी. तभी खाकी का मान भी लोगों की नजरों में ऊँचा होगा. तब आम नागरिक नहीं, अपराधी पुलिस से डरेंगे.

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
June 4, 2014

सुन्दर  सार्थक सुझावों सहित अच्छा लेख

    Ravinder kumar के द्वारा
    June 23, 2014

    निशा जी, धन्यवाद.

deepak pande के द्वारा
June 4, 2014

पुलिस की vidambana yah hai kee vardee hone की karan वह सबकी नजर में आ जाते हैं वार्ना कोई ऐसा office या डिपार्टमेंट बताएं जहा कोई व्यक्ति भ्रष्ट न हो

    Ravinder kumar के द्वारा
    June 23, 2014

    दीपक जी, आभार.

Shobha के द्वारा
June 6, 2014

जिस दिन पुलिस सुधर गई भूर कुछ बदल जायेगा बढिया लेख डॉ शोभा भारद्वाज

    Ravinder kumar के द्वारा
    June 23, 2014

    शोभा जी, आभार .

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 6, 2014

सार्थक आलेख काश कभी ये जनता के दोस्त बन जाते और क्रिमिनल के दुश्मन तो आनंद और आता विचारणीय पोस्ट भ्रमर ५

    Ravinder kumar के द्वारा
    June 23, 2014

    भ्रमर जी, धन्यवाद .

    Ravinder kumar के द्वारा
    June 23, 2014

    धन्यवाद जी.


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