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डॉक्टर साहब

Posted On: 12 Aug, 2014 Others,social issues,कविता में

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डॉक्टर साहब
आप भगवान हो
लेकिन आपका कृपाप्रसाद पाने को
हमें टटोलना पड़ता है
घर के हर कोने को
बच्चों के गुल्लक से लेकर
मंदिर तक
कितने ही मजबूर हैं
घर खेत यहाँ तक के मंगलसूत्र
बेचने को
आप मुझे अपने सामने
बैठाते हो
पर पता नहीं क्यों
समझ नहीं पाते मेरे हालात
कानों से लटकते आले को
मेरे दिल से लगाते तो हो
पर पता नहीं क्यों
समझ नहीं पाते
दिल का दर्द
मेरी आँखें तलाशती हैं
आपकी आखों में मेरे लिए संवेदना
पर आप एक मशीन की तरह
पुर्जा लिखने लगते हो
मैं उस पुर्जे को ऐसे देखता हूँ
जैसे सब पढ़ पाऊंगा
लेकिन तभी आप मुझे
बाहर का रास्ता दिखाते हो और कहते हो
नेक्स्ट
मैं शरीर से टूटा हुआ
मन से लाचार
जेब को टटोलते हुए
पुर्जे को थामे
घर की और चल पड़ता हूँ
ताकि
हो सके दवाइयों की व्यवस्था

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
August 13, 2014

सच कहा आदरणीय .

    Ravinder kumar के द्वारा
    August 13, 2014

    श्रीमान जी, समय देने के लिए धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 15, 2014

नेक्स्ट मैं शरीर से टूटा हुआ मन से लाचार जेब को टटोलते हुए पुर्जे को थामे घर की और चल पड़ता हूँ ताकि हो सके दवाइयों की व्यवस्था सब मशीनी हैं . वेदना विलुप्त हुई , रचना हेतु सादर बधाई

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 6, 2014

    प्रदीप जी, आपके पधारने का धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
August 15, 2014

बहुत भावपूर्ण रचना एक लम्बे समय बाद आपकी और से मिली ,यथार्थ को अभिव्यक्त करती

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 6, 2014

    निशा जी, आपकी लेखनी बहुत प्रभावित करती है. आपके विचार बहुत मूल्यवान है.

Udai Shankar Srivastava के द्वारा
September 7, 2014

सरल सब्दों में यथार्थ का चित्रण . बधाई हो मन को छूने के लिए .

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 9, 2014

    श्रीमान जी, आप आए अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दी; इसके लिए धन्यवाद.


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