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सैनिक या देवदूत

Posted On: 9 Sep, 2014 Others,कविता में

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चाहे केदारनाथ की त्रासदी हो या कश्मीर में बाढ़ का कहर. भारतीय सेना अपने जी जान से लग जाती है हमें बचाने में. जहां प्रशासन और सरकारों के प्रबंध विफल हो जाते हैं वहाँ भारत की सेना ही मोर्चा संभालती है और हमारी रक्षा करती है. भारतीय सेना के इसी जज्बे को देख कर मन में कुछ विचार उभरे. जिन्हें मैंने यहाँ प्रस्तुत किया है. भारतीय सेना जिंदाबाद भारत जिंदाबाद.

तुम्हें पहले कभी न देखा
न जान न पहचान
न पूछा तुम्हारा नाम
तुम सैनिक थे या देवदूत
मैं रहा निरा अंजान

पर दिल से था तुम्हारा इन्तजार
नेत्र चमके तुम्हें निहार
मैं मिट्टी में धंसा था
पत्थर के नीचे फंसा था
यम का फंदा गले में कसा था

कि तुमने हाथ पकड़ा
जिंदगी को कुछ जकड़ा
जीवन-मृत्यु के बीच खड़े थे
अंगद के पाँव से अड़े थे

मुझे उठाया सहलाया
पानी पीला सहारा दे उठाया
तुम्हारे कन्धों का पा सहारा
घड़ी भर तुम्हें निहार
तुम धीरे से मुस्कुराए
बैठा सपनों के उड़नखटोले में
जीवन तक ले आये

तुम कौन थे नहीं जान पाया
जीवन अपना है नहीं मान पाया
याद आते ही तुम्हारा चेहरा
हो जाता हूँ कृतज्ञता से दोहरा
शीश स्वतः ही झुक जाता है
हाथ अपने आप बंध जाते हैं
तुम्हारे सम्मान में.

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
September 13, 2014

बहुत उच्च कोटि का सद्पुदेश देती रचना आदरणीय,पर आज के समय की मांग यह भी है हर युवा एक सैनिक जैसा हो ,ताकि विपरीत समय में वह अपने समाज को बचा सके,आज हर घर में एक गाड़ी है ,पर गाड़ी के tube को निकालकर बाढ़ के वक्त पानी में डालना ,शायद कम ही लोग जानते हैं |

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 14, 2014

    श्रीमान जी, मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ के हर युवा एक सैनिक के जैसा हो ताकि समय पड़ने पर अपने घर और समाज को बचा सके. आपने समय दिया और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दे उत्साह वर्धन किया; आप का धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
September 22, 2014

सुन्दर सार्थक रचना रविन्द्र जी

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 22, 2014

    निशा जी, प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.

sadguruji के द्वारा
September 22, 2014

तुम कौन थे नहीं जान पाया जीवन अपना है नहीं मान पाया याद आते ही तुम्हारा चेहरा हो जाता हूँ कृतज्ञता से दोहरा शीश स्वतः ही झुक जाता है हाथ अपने आप बंध जाते हैं तुम्हारे सम्मान में ! आदरणीय रविन्द्र कुमार जी ! बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता ! गीत की तरह गुनगुनाते हुए पढ़ा ! सैनिको को नमन ! इस लयबद्ध उत्कृष्ट रचना के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! ऐसी ही रचना की पुन प्रतीक्षा में:शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !!

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 23, 2014

    सद्गुरु जी, समय निकाल कर प्रत्साहित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. आशा है भविष्य में भी आप का सहयोग मिलता रहेगा. प्रणाम .

September 23, 2014

देवदूत-सार्थक अभिव्यक्ति रविन्द्र जी

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 23, 2014

    शालिनी जी, बहुत बहुत धन्यवाद.

Bhola nath Pal के द्वारा
September 23, 2014

आदरणीय रवींद्रजी ! बहुत अच्छी प्रस्तुति | यह कविता नहीं, त्रासदी के शिकार हर भुक्त भोगी की अंतरात्मा का चित्रण है | सादर |

    Ravinder kumar के द्वारा
    September 23, 2014

    भोला नाथ जी, अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दे उत्साह वर्धन करने के लिए आप का धन्यवाद.


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