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माटी का दीपक

Posted On: 20 Oct, 2014 Others में

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दीपावली की चकाचौंध में
माटी का वो दीपक गुम है.
अमावस की गहन रात्रि में
जैसे चाँद-सितारे गुम हैं.
खरीदारों की भीड़-भाड़ में
जरूरतमंद इंसान वो गुम है.
मिठाइयों से भरे बाजार में
माँ के हाथ का स्वाद वो गुम है.
इंटरनेट और फ़ोन के युग में
सब का हाथ और साथ वो गुम है.
कपट-कूट से भरे व्यापार में
सीधी सी मुस्कान वो गुम है.
दीपावली की चकाचौंध में
माटी का वो दीपक गुम है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
October 21, 2014

सच तो है रविंदर जी, पर यही तो प्रभु की माया है, कहीं धूप तो कहीं छाया है. सादर!

sadguruji के द्वारा
January 3, 2015

बहुत सुन्दर और विचारणीय कविता ! आदरणीय रविंदर कुमार जी ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बधाई ! नववर्ष 2015 सबके लिए मंगलमय हो !


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